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महिला आरक्षण पर रोहिणी आचार्य का बड़ा सवाल, बोलीं—जमीन पर बराबरी नहीं तो कानून का क्या मतलब?

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पटना/आलम की खबर:
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर देशभर में जारी बहस के बीच बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ उस समय आया जब राष्ट्रीय जनता दल से जुड़ीं Rohini Acharya ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक लंबा और भावनात्मक पोस्ट साझा करते हुए महिलाओं की वास्तविक स्थिति पर गहरे सवाल खड़े कर दिए, उनके इस बयान ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी बल्कि समाज के उस पक्ष को भी सामने ला दिया जिस पर अक्सर चर्चा कम होती है, उन्होंने अपने पोस्ट के जरिए यह संकेत दिया कि केवल कानून बना देने भर से महिलाओं को वास्तविक समानता नहीं मिल सकती, जब तक जमीनी स्तर पर उनके सामने मौजूद समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता तब तक किसी भी आरक्षण का पूरा लाभ समाज तक नहीं पहुंच पाएगा।
रोहिणी आचार्य ने अपने विचारों में यह स्पष्ट किया कि आज भी देश के बड़े हिस्से में महिलाएं कई तरह की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही हैं, उन्होंने कहा कि गरीब तबके की महिलाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या शिक्षा और आत्मनिर्भरता की है, कई परिवारों में आज भी बेटियों की पढ़ाई को प्राथमिकता नहीं दी जाती और उन्हें कम उम्र में ही घरेलू जिम्मेदारियों में उलझा दिया जाता है, ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब आधारभूत स्तर पर ही असमानता मौजूद है तो केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने से क्या वास्तव में महिलाओं की स्थिति बदल पाएगी।
उन्होंने अपने पोस्ट में यह भी रेखांकित किया कि समाज में महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर आज भी दोहरा मापदंड देखने को मिलता है, चाहे वह मायके और ससुराल के बीच भेदभाव हो या फिर उनके पहनावे और जीवनशैली को लेकर की जाने वाली टिप्पणियां, इन सभी मुद्दों ने महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित कर रखा है, उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, जहां परंपराओं और सामाजिक दबाव के कारण महिलाएं अपने अधिकारों का खुलकर इस्तेमाल नहीं कर पातीं और कई बार उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
रोहिणी आचार्य ने महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को भी गंभीरता से उठाया और कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार दहेज, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, इन मामलों में पीड़ितों को न्याय पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है, कई बार सामाजिक दबाव और कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण महिलाएं अपनी आवाज उठाने से भी कतराती हैं, उन्होंने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि जब तक महिलाओं को सुरक्षित वातावरण नहीं मिलेगा, तब तक उनके सशक्तिकरण की बात अधूरी ही रहेगी।
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर भी उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि आज के दौर में जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म लोगों को अपनी बात रखने का अवसर देते हैं, वहीं महिलाओं के लिए यह एक नई चुनौती भी बनकर उभरा है, उन्होंने कहा कि कई बार महिलाएं जब अपने अधिकारों या आत्मसम्मान के लिए आवाज उठाती हैं, तो उन्हें ट्रोलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है और वे मानसिक दबाव में आ जाती हैं।
उन्होंने समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, उन्होंने यह भी कहा कि कानूनी तौर पर महिलाओं को संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिला हुआ है, लेकिन व्यवहारिक रूप में कई जगहों पर उन्हें इस अधिकार से वंचित रखा जाता है, जो यह दर्शाता है कि कानून और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बड़ा अंतर है।
महिला आरक्षण विधेयक के संदर्भ में उन्होंने यह तर्क रखा कि जब तक महिलाओं को शिक्षा, सुरक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक केवल आरक्षण के जरिए उनकी स्थिति में व्यापक सुधार संभव नहीं है, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर स्तर पर बदलाव की आवश्यकता है, ताकि महिलाएं वास्तव में सशक्त हो सकें और उन्हें बराबरी का अधिकार मिल सके।
रोहिणी आचार्य के इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में एक नई बहस शुरू हो गई है, जहां एक ओर उनके समर्थक इसे जमीनी हकीकत को सामने लाने वाला बयान बता रहे हैं, वहीं विरोधी दल इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं, लेकिन इतना तय है कि इस मुद्दे ने महिलाओं के अधिकार और उनकी वास्तविक स्थिति को लेकर एक बार फिर गंभीर चर्चा को जन्म दे दिया है, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में इस बयान पर अन्य राजनीतिक दल और समाज के विभिन्न वर्ग किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं और क्या यह बहस किसी ठोस बदलाव की दिशा में आगे बढ़ती है।
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